कृषि विज्ञान केंद्र एवं किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग शहडोल के संयुक्त तत्वावधान में 04 अक्टूबर 2026 को ग्राम मझगवां एवं सलियाटोला में भ्रमण कर कृषकों को फसलों में समसामयिक कृषि सलाह दी गई तथा फसलों में लगने वाले कीट एवं रोगों की रोकथाम के संबंध में जागरूक किया गया।
केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने कृषकों को बताया कि सरसों रबी मौसम में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण फसल है। सरसों वर्गीय फसलों में तोरिया, राया, तारामीरा, भूरी एवं पीली सरसों शामिल हैं। उन्होंने बताया कि सरसों की बुवाई के लिए किसान खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें। अक्टूबर माह में सरसों की बुवाई प्रारंभ हो जाती है। सरसों को तना गलन रोग से बचाने के लिए बुवाई से पहले बीज को कार्बेन्डाजिम नामक दवा से 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि जिन किसानों के पास सिंचाई के सीमित साधन हैं और रबी मौसम में खेत खाली रह जाते हैं, उनके लिए सघन खेती के रूप में उतेरा खेती महत्वपूर्ण विकल्प साबित हो सकती है। उतेरा खेती का मुख्य उद्देश्य खेत में मौजूद नमी का उपयोग अगली फसल के अंकुरण एवं वृद्धि के लिए करना है। वर्षा आधारित धान की खेती वाले क्षेत्रों में धान की कटाई से 10-15 दिन पूर्व अलसी, मसूर, मटरी एवं तिवड़ा के बीजों का खेत में छिड़काव कर बुवाई की जानी चाहिए। इससे धान की कटाई के समय बीज खेत में उपलब्ध नमी का उपयोग करते हुए अंकुरित हो जाते हैं और संचित नमी से फसल पककर तैयार हो जाती है। इससे किसानों को धान के साथ दलहन एवं तिलहन की अतिरिक्त उपज भी प्राप्त होती है।
डॉ. प्रजापति ने बताया कि लंबी अवधि वाली धान की फसल में भूरा माहू (ब्राउन प्लांट हॉपर) का प्रकोप देखा जा रहा है। इसका प्रकोप अक्टूबर-नवंबर माह में अधिक होता है। भूरा माहू धान की फसल के लिए हानिकारक कीट है। इसके शिशु एवं प्रौढ़ दोनों अवस्था धान के पौधे के तने से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 1500 पीपीएम वाले एजाडिरेक्टिन (नीम ऑयल) का 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर सुरक्षात्मक रूप से अथवा कीट का प्रकोप प्रारंभ होते ही छिड़काव करने की सलाह दी गई।
अमरबेल के नियंत्रण के बताए उपाय
डॉ. प्रजापति ने किसानों को अमरबेल के संबंध में भी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अमरबेल तना परजीवी पौधा है, जो फसलों एवं वृक्षों पर अवांछित रूप से उगकर नुकसान पहुंचाता है। यह खरपतवार चना, मसूर, उड़द, मूंग जैसी दलहनी तथा रामतिल, अलसी जैसी तिलहनी एवं बरसीम और लूसर्न जैसी चारा फसलों में देखा जा सकता है। अमरबेल में उगने के 25-30 दिन बाद सफेद अथवा हल्के पीले रंग के पुष्प गुच्छे निकलते हैं।
उन्होंने किसानों को सलाह दी कि बुवाई के लिए हमेशा प्रमाणित बीज का ही उपयोग करें। उपयोग की जाने वाली गोबर की खाद पूर्णतः सड़ी हुई एवं खरपतवार के बीजों से मुक्त होनी चाहिए। पशुओं को खिलाए जाने वाले चारे में भी अमरबेल के बीज नहीं होने चाहिए। यदि खेत में अमरबेल का प्रकोप थोड़ी-थोड़ी जगह पर हो तो उसे उखाड़कर एकत्रित कर जला देना चाहिए। इसके नियंत्रण के लिए पेन्डीमेथालिन 30 प्रतिशत (ईसी) नामक शाकनाशी रसायन को 1.0 किलोग्राम व्यापारिक मात्रा प्रति एकड़ की दर से बुवाई के बाद, लेकिन अंकुरण से पूर्व छिड़काव करने की सलाह दी गई। उक्त मात्रा को 150 लीटर पानी में घोल बनाकर फ्लैटफैन नोजल लगे स्प्रेयर से प्रति एकड़ समान रूप से छिड़काव करने से अमरबेल का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।
फसल चक्र एवं जैविक कीटनाशकों के उपयोग की दी सलाह
कृषि विस्तार अधिकारी सोहागपुर सुश्री भावना मिश्रा ने किसानों को बताया कि लगातार एक ही प्रकार की फसल उगाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति में गिरावट आती है। इसके साथ ही कीट, रोग एवं खरपतवारों का नियंत्रण भी गंभीर समस्या बन जाता है। फसल चक्र अपनाकर एवं फसल विविधीकरण के माध्यम से इन समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
उन्होंने जैविक कीटनाशकों के उपयोग पर जोर देते हुए बताया कि जैविक कीटनाशकों का मनुष्य, मिट्टी, पैदावार एवं पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता तथा फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों एवं बीमारियों की प्रभावी रोकथाम की जा सकती है। इसलिए जब भी कीटनाशकों के उपयोग की आवश्यकता हो, किसानों को प्राथमिकता से जैविक कीटनाशकों का उपयोग करना चाहिए। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ फसलों को कीट एवं रोगों से बचाने में भी मदद मिलती है।



